Monday, November 19, 2018

अमृतसर हमले से लौटी 40 साल पुरानी दहशत

पंजाब के अमृतसर जिले के राजसांसी इलाके में रविवार को निरंकारी सत्संग में ग्रेनेड अटैक हुआ. इस हमले में तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि 20 अन्य घायल हुए हैं.

यह ग्रेनेड हमला अमृतसर से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित आदिलवाल गांव में निरंकारी पंथ के सत्संग भवन में हुआ है. इस हमले के पीछे हुई साजिश की परतें खुलती जा रही हैं. पंजाब पुलिस के सूत्रों की मानें तो हमले के पीछे खालिस्तानी समर्थकों का हाथ है, जिन्होंने लोकल लड़कों को बहकाकर इस हमले को अंजाम दिया. इसमें आईएसआई कनेक्शन भी सामने आ रहा है.

ऐसा पहली बार नहीं है, जब खालिस्तानी समर्थकों का नाम इस तरह के हमले में आया है. 40 साल पहले भी सिख समुदाय से जुड़े कुछ समूहों ने अमृतसर में निरंकारी भवन को निशाना बनाया था. 13 अप्रैल, 1978 को बैसाखी के मौके पर ये हमला किया गया था, जिसके बाद अकाली और निरंकारी समूहों के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें 13 अकाली मारे गए थे.

इस खूनी संघर्ष के विरोध में जब अकालियों ने प्रदर्शन किया था तो उस दौरान आतंकी जरनैल सिंह भिडंरावाला इस मोर्चे में शामिल हुआ था. माना जाता है कि इस घटना के बाद से ही पंजाब में आतंकवाद ने पैर पसारने शुरू किए थे.

ताजा हमला रविवार (18 नवंबर) को उस वक्त हुआ, जब लोग प्रार्थना के लिए एकत्र हुए थे. वहां करीब 200 लोग मौजूद थे. देश-विदेश में निरंकारी अनुयायियों की संख्या लाखों में है. इसका मुख्यालय दिल्ली में है.

में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़े मामले में आज सर्वोच्च अदालत में सुनवाई होनी थी, लेकिन अब ये 26 नवंबर तक टल गई है. इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दिए जाने के खिलाफ याचिका दायर की गई है, इसे पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने दायर किया है.

आपको बता दें कि इस मामले में जांच कर रही एसआईटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तब गुजरात के मुख्यमंत्री) को क्लीन चिट दे दी थी. इसी फैसले के खिलाफ याचिका डाली गई है.

13 नवंबर को हुई सुनवाई में सर्वोच्च अदालत ने इस याचिका को मंजूर किया था. मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट जस्टिस ए. एम खानविलकर और दीपक गुप्ता नेएसआईटी रिपोर्ट का अध्ययन करने की बात कही थी.

आपको बता दें कि 2008 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित SIT ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी औरअन्य लोगों को क्लीन चिट दी थी. जिसके बाद इस मामले में उनके खिलाफ कोई पुख्तासबूत ना होने की बात कही थी.

Sunday, November 11, 2018

'पड़ोसी दुश्मन ही सही पर कुछ मामलों में हम जैसा है'

मुझे आज तक समझ नहीं आया कि जितने भी धर्म आधारित गुट और सियासी संस्थाएं हैं उन्हें एक दूसरे का दुश्मन होने के बावजूद एक ही विचारधारा के चश्मे से पानी पीने में कोई आपत्ति क्यों नहीं?

मसलन, लिबरल और सेक्युलर सोच हिंदू उग्रवादियों के नज़दीक भी देशद्रोह के बराबर है और मुसलमान अतिवादी भी उन्हें गद्दार और धर्म का दुश्मन समझकर नफ़रत करते हैं.

सेक्युलर तालीम हिंदु और मुसलमान उग्रवादी बड़े शौक से हासिल करते हैं. एक से एक नया गैजेट, गाड़ी, सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल करने में उन्हें किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं.

कोई उग्रवादी मोबाइल फ़ोन का नया मॉडल लेने से कभी मना नहीं करेगा. मगर नई सोच को अपनाना छोड़ उसे सुनने से भी इनकार करके उल्टा आपके मुंह पर हाथ रख देगा.

पश्चिम में रेनेसां पीरियड में जहां और चीजें आईं, वहीं वैज्ञानिक सोच और शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए यूनिवर्सिटीज़ भी तेज़ी से खुलनी शुरू हुईं.

रफ़्ता-रफ़्ता यूनिवर्सिटी ऐसी जगह कहलाने लगीं जहां नई सोच की कोपलें फूटती हैं. कोई भी विद्यार्थी या गुरू किसी भी विषय पर कोई भी सवाल उठा सकता है और जवाब चाटे, थप्पड़ या गाली से नहीं बल्कि दलील से देना पड़ता है.

मगर दुनिया लगता है कि उसी ज़माने की ओर धकेली जा रही है जिससे जान बचाकर भागी थी. फ़ासिज़्म राजनीति को लपेट में लेने के बाद अब यूनिवर्सिटिज़ से भी ऑक्सिजन ख़त्म कर रहा है.

रफ़्ता-रफ़्ता यूनिवर्सिटी को भी धार्मिक मदरसों में ढालने की कोशिश हो रही है और सवाल पूछना जुर्म बन रहा है.

पाकिस्तान में आपको याद होगा कि किसी तरह एक सेक्युलर नेता ख़ान अब्दुर वली ख़ान के नाम पर बनी यूनिवर्सिटी में पिछले वर्ष एक छात्र मिशाल ख़ान को उन्हीं के साथी लड़कों ने तौहीन-ए-रिसालत का झूठा इल्ज़ाम लगाकर मार डाला.

उनके कत्ल की जुर्म में सिर्फ पांच लोग इस वक़्त जेल में हैं. बाकी छूट गए.

डॉक्टर मुबारक अली पाकिस्तान के जाने माने इतिहासकार हैं मगर कोई भी विश्वविद्यालय उन्हें पढ़ाने का काम देते हुए डरती हैं. डॉक्टर परवेज़ हूद भाई को धार्मिक गुट शक की नज़र से देखते हैं.

सरकारी यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले ज़्यादातर प्रोफ़ेसर न सवाल करने की इजाज़त देते हैं. न हर सवाल का जवाब खुलकर समझाते हैं.

ऐसे में जब सीमापार से ये ख़बर आती है कि प्रोफे़सर रामचंद्र गुहा जैसे जाने माने इतिहासकार ने धमकियां मिलने पर अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाने से इनक़ार कर दिया है या दिल्ली यूनिवर्सिटी में पोस्ट ग्रेजुएट क्लासों में से प्रोफेसर कांचा इलैया की पुस्तकें हटा दी गई हैं. या किसी यूनिवर्सिटी में अब कोई सेमिनार या वर्कशॉप ऐसा नहीं हो सकता कि जिससे सरकार की नाराज़गी का ख़तरा हो तो मुझे बड़ा आनंद मिलता है.

ये सोच सोच कि हम अकेले नहीं हैं. पड़ोसी दुश्मन ही सही पर, उसकी दुसराहट इतनी बुरी भी नहीं.